भारत में अब तक कई प्रधानमंत्री हुए.सब की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं.अपना एक ख़ास परिचय है.मगर, एक ऐसा व्यक्ति भी सत्ता के शिखर पर पहुंचा, प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुआ, जो बचपन से ही शब्दों को पिरोने-सजाने की अद्भुत कला में माहिर था.उसका विशाल और शक्तिशाली कवि ह्रदय नीरस और बेरंग राजनीति में भी रस और रंग भर देता था.
वह व्यक्ति था अटल बिहारी वाजपेयी.बहुमुखी प्रतिभा का धनी.कला और राजनीति का संगम.एक अध्यापक और सिद्धहस्त कवि-पुत्र अटल को काव्य-रचना के गुण विरासत में मिले थे.अटल जी ने दसवीं की पढ़ाई के दौरान ही एक अद्भुत कविता लिख दी थी.वह कविता है- 'रग रग हिन्दू मेरा परिचय', जिसकी काफ़ी सराहना ही नहीं होती, दुनियाभर में करोड़ों लोग पसंद करते और गुनगुनाते हैं.
जानकारों के अनुसार, अटल जी की यह कविता अटल जी और राजीव लोचन अग्निहोत्री के संपादकत्व में निकली मासिक पत्रिका 'राष्ट्रधर्म' के प्रथम अंक के प्रथम पृष्ठ पर 31 अगस्त, 1947 को रक्षाबंधन के दिन प्रकाशित हुई थी.
'परिचय' शीर्षक से यह रचना 'मेरी इक्यावन कवितायेँ' में संग्रहित है-
मैं शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार-क्षार|
डमरू की वह प्रलय-ध्वनि हूं जिसमें नचता भीषण संहार|
रणचंडी की अतृप्त प्यास, मैं दुर्गा का उन्मत्त हास|
मैं यम की प्रलयंकर पुकार, जलते मरघट का धुआंधार|
फिर अन्तरतम की ज्वाला से, जगती में आग लगा दू मैं|
यदि धधक उठे जल, थल, अम्बर, जड़, चेतन तो कैसा विस्मय?
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय !
मैं आदि पुरुष, निर्भयता का वरदान लिए आया भू पर |
पय पीकर सब मरते आए, मैं अमर हुआ लो विष पी कर|
अधरों की प्यास बुझाई है, पीकर मैंने वह आग प्रखर|
हो जाती दुनिया भस्मसात, जिसको पल भर में ही छूकर|
भय से व्याकुल फिर दुनिया ने प्रारंभ किया मेरा पूजन|
मैं नर, नारायण, नीलकंठ बन गया न इस में कुछ संशय|
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय !
मैं अखिल विश्व का गुरू महान, देता विद्या का अमरदान|
मैंने दिखलाया मुक्ति-मार्ग, मैंने सिखलाया ब्रह्मज्ञान|
मेरे वेदों का ज्ञान अमर, मेरे वेदों की ज्योति प्रखर|
मानव के मन का अंधकार, क्या कभी सामने सका ठहर?
मेरे स्वर नभ में घहर-घहर, सागर के जल में छहर-छहर|
इस कोने से उस कोने तक, कर सकता जगती सौरभमय|
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय !
मैं तेज पुंज, तमलीन जगत में फैलाया मैंने प्रकाश|
जगती का रच करके विनाश, कब चाहा है निज का विकास?
शरणागत की रक्षा की है, मैंने अपना जीवन दे कर|
विश्वास नहीं आता तो साक्षी है यह इतिहास अमर|
यदि आज देहली के खण्डहर, सदियों की निद्रा से जगकर|
गुंजार उठे उंचे स्वर से 'हिन्दू की जय' तो क्या विस्मय?
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय !
दुनिया के वीराने पथ पर जब-जब नर ने खाई ठोकर|
दो आंसू शेष बचा पाया जब-जब मानव सब कुछ खोकर|
मैं आया तभी द्रवित होकर, मैं आया ज्ञानदीप ले कर|
भूला-भटका मानव पथ पर चल निकला सोते से जग कर|
पथ के आवर्तों से थक कर, जो बैठ गया आधे पथ पर|
उस नर को राह दिखाना ही मेरा सदैव का दृढ़ निश्चय|
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय !
मैंने छाती का लहू पिला पाले विदेश के क्षुधित लाल|
मुझ को मानव में भेद नहीं, मेरा अन्तस्थल वर विशाल|
जग के ठुकराए लोगों को, लो मेरे घर का खुला द्वार|
अपना सब कुछ लुटा चुका, फिर भी अक्षय है धनागार|
मेरा हीरा पाकर ज्योतित परकीयों का वह राजमुकुट|
यदि इन चरणों पर झुक जाए कल वह किरीट तो क्या विस्मय?
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय !
मैं वीर पुत्र, मेरी जननी के जगती में जौहर अपार|
अक़बर के पुत्रों से पूछो, क्या याद उन्हें मीना बाज़ार?
क्या याद उन्हें चितौड़ दुर्ग में जलने वाला आग प्रखर?
जब हाय सहस्रों माताएं, तिल-तिल जलकर हो गईं अमर|
वह बुझने वाली आग नहीं, रग-रग में उसे समाए हूं|
यदि कभी अचानक फूट पड़े विप्लव लेकर तो क्या विस्मय?
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय !
होकर स्वतंत्र मैंने कब चाहा है कर लूं जग को ग़ुलाम?
मैंने तो सदा सिखाया करना अपने मन को ग़ुलाम|
गोपाल-राम के नामों पर कब मैंने अत्याचार किए?
कब दुनिया को हिन्दू करने घर-घर में नरसंहार किए?
कब बतलाए काबुल में जा कर कितनी मस्जिद तोड़ी?
भू-भाग नहीं शत-शत मानव के ह्रदय जीतने का निश्चय|
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय !
मैं एक बिंदु, परिपूर्ण सिन्धु है यह मेरा हिन्दू समाज|
मेरा-इसका संबंध अमर, मैं व्यक्ति और यह है समाज|
इससे मैंने पाया तन-मन, इससे मैंने पाया जीवन|
मेरा तो बस कर्तव्य यही, कर दूं सब कुछ इसके अर्पण|
मैं तो समाज की थाती हूं, मैं तो समाज का हूं सेवक|
मैं तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता बलिदान अभय|
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय !
