पैग़म्बर मोहम्मद पर टिप्पणी को लेकर बवाल, शिवलिंग के अपमान की चर्चा भी नहीं!

नुपूर शर्मा ने पैग़म्बर मोहम्मद को लेकर टिप्पणी की तो हंगामा खड़ा हो गया, देशभर में प्रदर्शन हुआ, तोड़फोड़ और आगजनी हुई.विदेशों में भी इसकी गूंज सुनाई दी.खाड़ी देशों और ख़ासतौर से संयुक्त अरब अमीरात के रूख से भारत सरकार बैकफुट पर नज़र आई.मगर हैरानी की बात यह है कि भगवान शिव या शिवलिंग के अपमान को लेकर चर्चा भी नहीं हुई.विदेशों की बात छोड़िये, देश की मुख्यधारा की मीडिया ने भी इसे बहस का मुद्दा नहीं समझा.फिर वही हुआ, जो अब तक होता आया है.मध्यांतर (Interval) से पहले के सीन में विलेन बनकर उभरा तस्लीम रहमानी हीरो बन गया, जबकि बाद उसका ज़वाब देने आई नुपूर शर्मा को आंख मूंदकर विलेन क़रार दे दिया गया.यह एक मुर्दा और ज़िन्दा समाज में फ़र्क को तो दर्शाता ही है, 21वीं सदी के कथित बदलते भारत को विश्व पटल पर बहुत बौना साबित भी करता है.बहरहाल, इस पूरे प्रकरण को लेकर कई प्रश्न भी खड़े होते हैं.पहला, क्या शिवलिंग का अपमान मायने नहीं रखता? दूसरा, मुहम्मद साहब के बारे में कही गई बात ग़लत है, या फिर कहने का तरीक़ा ग़लत था? तीसरा, क्या इस्लाम में दूसरे धर्म-मज़हब के ईश्वर का मज़ाक़ उड़ाने की इज़ाज़त है? चौथा, क्या पैग़म्बर मुहम्मद और उनके परिवार की चर्चा करना ग़लत है? वर्तमान हालात में इन सब विषयों पर चर्चा आवश्यक है.

पैग़म्बर पर टिप्पणी, शिवलिंग का अपमान, दोहरा रवैया
शिवलिंग का अपमान-पैग़म्बर पर टिप्पणी और बवाल (प्रतीकात्मक)

 
अपमान किसी का भी हो, इसे जायज़ नहीं कहा जा सकता.मगर, इसमें दो बातें हो सकती हैं, एक, या तो ऐसा जानबूझकर किया गया हो, या फिर अनजाने में या भूलवश मुंह से ऐसे शब्द निकल निकल गए हों, जो भावनाओं को आहत करने वाले हों.साथ ही, कहने का तरीक़ा भी मायने रखता है.यानि ग़लत तरीक़े से कही गई सही या अच्छी बात भी अपमानजनक हो सकती है.


शिवलिंग का अपमान

PFI-SDPI नामक संगठन-राजनितिक दल के एक नेता तस्लीम रहमानी ने एक डिबेट शो के दौरान सनातनी हिन्दुओं के  आराध्यदेव भगवान शिव के प्रतीक शिवलिंग पर अभद्र टिप्पणी की.उसने ऐसा एक बार नहीं, बल्कि बार-बार और लगातार किया, मज़ाक़ उड़ाता रहा.उसके हाव-भाव से स्पष्ट पता चलता है कि वह बड़े ठंडे दिमाग से और जानबूझकर एक रणनीति के तहत ऐसा कर रहा था.दरअसल, वह उकसा रहा था, ताकि विवाद खड़ा हो, जो हुआ भी.

अब देखें तो यह कृत्य न सिर्फ़ सामाजिक-धार्मिक नज़रिए से अनुचित है, बल्कि कानूनी नज़रिए से भी ग़लत और आपराधिक है.

शिवलिंग का अपमान कुरान के हुक्म के ख़िलाफ़ है.सुरह अल-अनआम की आयत संख्या 108 (सुरह 6:108) में बड़ा साफ़ कहा गया है-

'' ऐ ईमान वालों! उन्हें बुरा न कहो, जिन्हें (दूसरे धर्म-मज़हब के देवी-देवता या ईश्वर) वे अल्लाह के सिवा पुकारते हैं.वर्ना, वे हद से आगे बढ़कर अज्ञानवश अल्लाह के प्रति अपशब्द का प्रयोग करेंगें.इसी प्रकार हमने हर एक गिरोह (कौम) के लिए उसके कर्म को सुहावना बना दिया है.फिर, उन्हें अपने रब की ओर ही लौटना है.उस वक़्त वह उन्हें बता देगा, जो कुछ वे करते रहे होंगें. ''
 
यानि मुसलमानों को अल्लाह की तरफ़ से दूसरे धर्म-मज़हब के आराध्य (पूजे जाने वाले, देवी-देवता, ईश्वर) के अपमान की स्पष्ट मनाही है.उन्हें यह बता दिया गया है कि अगर वे दूसरों के भगवानों को बुरा-भला कहेंगें, तो दूसरे भी ऐसा ही करेंगें या उससे भी आगे जाकर, उसी तरह की ग़लतियां दुहराएंगें.लोग अपमान का ज़वाब अपमानजनक तरीक़े से देंगें.

पैग़म्बर पर टिप्पणी, शिवलिंग का अपमान, दोहरा रवैया
सुरह अल-अनआम की आयत संख्या 108 (स्क्रीनशॉट)


मगर, हैरानी की बात यह है कि किसी भी मुसलमान (भारत में रहने वाला या विदेशी) ने इस बात पर ग़ौर नहीं किया.शिवलिंग का अपमान करने करने वाले के ख़िलाफ़ फ़तवे देना तो दूर अफ़सोस भी ज़ाहिर नहीं किया.ये कैसे मुसलमान हैं?

सियासी लोग हों या उलेमा सब एक ही रंग में रंगे नज़र आए.

ओवैसी तो नेता हैं, क्या मौलाना मदनी ने भी कुरान नहीं पढ़ा? फिर, किस बात के वे इस्लाम के ठेकेदार बनते हैं?

  

शिवलिंग पर टिप्पणी-उकसाना आपराधिक कृत्य

तस्लीम रहमानी ने न केवल शिवलिंग पर अभद्र टिप्पणी की, बल्कि उकसाया भी.इसलिए उनके ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की दो धाराओं के तहत मामला बनता है, या दंडित किए जाने का प्रावधान है.


धार्मिक भावनाएं आहत करने का मामला

तस्लीम रहमानी ने हिन्दुओं की आस्था के प्रतीक शिवलिंग को लेकर अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया.उन्होंने शिवलिंग की तुलना सांसारिक वस्तुओं से की तथा उसका मज़ाक़ उड़ाया, जिससे करोड़ों हिन्दुओं की भावना आहत हुई.

ज्ञात हो कि भारत के किसी नागरिक या नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करना जुर्म माना गया है और इसके लिए भारतीय संविधान की दंड संहिता, 1860 की धारा 295ए के तहत सज़ा का प्रावधान है.

भारतीय दंड संहिता, 1860, की धारा 295ए में कहा गया है-

'' जो कोई भारत के नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं (Religious Feelings) को आहत (Hurt, Insult) करने के विमर्शित (Deliberate) और विद्वेषपूर्ण आशय (Malicious Intention) से उस वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान, उच्चारित या लिखित शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपणों द्वारा या अन्यथा करेगा या करने का प्रयत्न करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन साल तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दंडित किया जायेगा. ''

यानि कोई व्यक्ति किसी की आस्था के प्रतीकों-स्थलों या ऐसी किसी भी चीज़ को, जिसे वह पवित्र मानता है, आदर-आराधना करता है, उसका, जानबूझकर या ग़लत इरादों से अपमान या अपमान करने की कोशिश करता है, तो इसे अपराधी जाएगा.इसके लिए तरीक़ा कोई भी हो, चाहे बोलकर या लिखकर या संकेतों (इशारों) या फिर चित्र-वीडियो के ज़रिए हो, अपराध ही माना जाएगा, सज़ा मिलेगी.


उकसाने या भड़काने का मामला

तस्लीम रहमानी का लहज़ा भडकाऊ था.उन्होंने भाजपा प्रवक्ता इस्लाम और कुरान के बारे में बोलने के लिए उकसाया, जो कि कानून की नज़र में अपराध है.आईपीसी (IPC) की धारा 504 कहती है-

'' जो कोई किसी व्यक्ति को सांश्य अपमानित करता है और तदद्वारा उस व्यक्ति को इस आशय से, या यह संभाव्य जानते हुए प्रकोपित करता है कि ऐसे प्रकोपन से वह लोक शांति भंग या कोई अन्य अपराध कारित कर सकता है, तो वह दोनों में से किसी तरह के कारावास से, जिसकी अवधि दो साल तक की हो सकेगी, या जुर्माने से या दोनों तरह से दंडनीय है. ''
 
यानि यहां यह स्पष्ट है कि जो कोई भी किसी व्यक्ति को उकसाने के इरादे से जानबूझकर उसका अपमान करता है यानि इरादतन उसे लोकशांति भंग करने या कोई अन्य अपराध करने के लिए भड़काता या उकसाता है, तो वह धारा 504 के तहत दोषी माना जाएगा.उसे दो साल तक की सज़ा या जुर्माना या फिर दोनों से दंडित किया जाएगा.
     
मगर, ये कितनी अज़ीब बात है कि तस्लीम रहमानी के कृत्यों या आपराधिक बर्ताव को लेकर कहीं कोई चर्चा तक नहीं हुई.न किसी बुद्धिजीवि का बयान आया और न किसी लेखक-विचारक के लेख और विचार ही आए.ना यह किसी न्यूज़ चैनल के डिबेट शो का मुद्दा बना और ना ही इसे किसी अख़बार में दो लाइनों की जगह नसीब हो सकी.

भाजपा ने तो हद ही कर दी.पूरे प्रकरण में निशाने पर आई भाजपा के थिंक टैंकों को भी इन कानूनी पहलूओं का विचार नहीं आया या फिर जानबूझकर वे भी चुप्पी साध गए और ऐसा प्रदर्शित किया कि मानो भारत की बौद्धिक क्षमता को लकवा मार गया हो.

    

क्या ग़लत है- पैग़म्बर मोहम्मद पर कही गई बात या कहने का तरीक़ा?

नुपुर शर्मा ने कुरान और हदीसों के हवाले से धरती चपटी होने, पैग़म्बर की बुर्राक़ (इस्लामी मान्यता के अनुसार मानव शक्ल वाला गधे/खच्चर से बड़ा और घोड़े से छोटा जानवर) पर सवार होकर स्वर्ग यात्रा (इसरा और मिराज) और पैगम्बर मोहम्मद की शादी का ज़िक्र किया.ख़ासतौर से, पैग़म्बर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की छोटी उम्र की हज़रत आयशा से निकाह-शादी की बात, जिसको लेकर लोगों को एतराज़ है, वह ग़लत है या सही, इस पर चर्चा करना आवश्यक हो जाता है.


निक़ाह के वक़्त हज़रत आयशा की उम्र

भारत जैसे सेक्यूलर देश में हज़रत आयशा की उम्र (शादी के वक्त) की चर्चा को लेकर बवाल खड़ा हो गया, जबकि पाकिस्तान जैसे कट्टर इस्लामी मुल्क में इस पर बाक़ायदा शोध हो चुका है, किताब भी छपी है मगर, किसी को ऐतराज़ नहीं है.'द एज ऑफ़ आयशा' के नाम से अल्लामा हबीब-उर-रहमान सिद्धीकी कंधालवी की लिखी मशहूर किताब पाकिस्तान समेत सारी दुनिया में पढ़ी और मानी जाती है.शोधकर्ता ने इसमें मुस्लिम जगत के तमाम मौलाना-मुफ्तियों या उलेमा के दावों को खारिज करते हुए लिखा है कि हज़रत आयशा की उम्र पैग़म्बर मुहम्मद से शादी के वक़्त 6 साल और शारीरिक संबंध स्थापित होने के वक़्त 9 साल थी.

पैग़म्बर पर टिप्पणी, शिवलिंग का अपमान, दोहरा रवैया
'द एज ऑफ़ आयशा' नामक पाकिस्तान में छपी किताब   

 
यह तो हुई शोध पर आधारित एक किताब की बात.तमाम हदीसों (अहादीस) में भी इसकी चर्चा है, जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकता.

सबसे प्रामाणिक समझी जाने वाली हदीसों में सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम में भी बाक़ायदा इसका वर्णन मिलता है.

सहीह मुस्लिम की किताब संख्या 16 की हदीस संख्या 82 में कहा गया है-

आयशा (अल्लाह उन पर मेहरबान हो) ने बताया:
'' अल्लाह के रसूल ने मुझसे शादी की थी तब मैं छह साल की थी, और जब मुझे उनके घर ले जाया गया था, तब मैं नौ साल की थी. ''

स्पष्ट है कि शादी के वक़्त हज़रत आयशा की उम्र 6 साल की थी, जबकि उन्हें मायके से ससुराल यानि पैग़म्बर मोहम्मद के घर ले जाया गया, तो वह नौ साल की थीं.


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सहीह मुस्लिम, किताब संख्या 16, हदीस संख्या 82 (स्क्रीनशॉट)


सहीह मुस्लिम की एक और हदीस में भी हज़रत आयशा की शादी के वक़्त उनकी उम्र को लेकर चर्चा मिलती है.सहीह मुस्लिम की किताब संख्या 16 की हदीस संख्या 83 में कहा गया है-

'' आयशा (अल्लाह उन पर मेहरबान हो) ने बताया कि अल्लाह के रसूल ने सात साल की उम्र में उनसे शादी की थी, और जब वह नौ साल की थीं, तब उन्हें दुल्हन के रूप में उनके (पैग़म्बर मोहम्मद के) घर ले जाया गया था, और उनकी गुड़िया उनके साथ थी; और जब उनका (पैग़म्बर मोहम्मद का) इंतिक़ाल हुआ, तो वह (हज़रत आयशा) 18 साल की थीं. ''

यहां बताया जा रहा है कि शादी के वक़्त हज़रत आयशा सात साल की थीं और पैग़म्बर मोहम्मद के घर पहुंचीं, तो वह नौ साल की थीं.उस वक़्त उनकी गुड़िया उनके साथ थी.

हज़रत आयशा आगे नौ सालों तक पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के साथ रहीं.जब पैग़म्बर मोहम्मद की मृत्यु हुई, तो वह 18 बरस की थीं.


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सहीह मुस्लिम, किताब संख्या 16, हदीस संख्या 83 (स्क्रीनशॉट)


सहीह बुख़ारी में भी हज़रत आयशा की शादी और उनकी उम्र को लेकर बाक़ायदा वर्णन मिलता है.सहीह बुख़ारी की हदीस संख्या 5133 (किताब संख्या 67 हदीस संख्या 69) में कुछ इस प्रकार कहा गया है-

आयशा ने बताया:
'' कि पैग़म्बर ने उनसे शादी की जब वह छह साल की थीं और जब वह नौ साल की थीं, तब उन्होंने शादी का रिश्ता क़ायम किया, और फिर वह नौ साल (यानि पैग़म्बर की मृत्यु तक) उनके साथ रहीं. ''

यानि हज़रत आयशा की शादी/निक़ाह के समय उनकी उम्र छह साल की और जब शादी का रिश्ता (शौहर-बीवी के बीच आपसी रिश्ता) क़ायम/स्थापित हुआ तब उनकी उम्र नौ साल की रही थी.फिर, वे पैग़म्बर मोहम्मद की आख़िरी सांस तक (अगले नौ साल तक) उनके साथ रहीं.

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सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या 5133 (स्क्रीनशॉट) 
 

ज्ञात हो कि कई बार सहीह बुख़ारी/इसकी हदीसों (Report) को कुरान के समतुल्य समझा जाता है, और इन्हें समान रूप में मान्यता प्राप्त है.ऐसे में, इसमें कही गई बात पर सवाल उठाना या आपत्ति करना उचित प्रतीत नहीं होता.

बहरहाल, एक अन्य प्रामाणिक हदीस संग्रह सुनन अबू दाउद की हदीस संख्या 2121 (या 2116) में कहा गया है-

आयशा ने बताया (आयशा से रिवायत है):
'' अल्लाह के रसूल ने मुझसे शादी की/कर ली थी, जब मैं सात साल की थी.बयान (हदीस) करने वाले (कथावाचक) सुलेमान ने कहा: या छह साल.जब मैं नौ साल की थी तब उन्होंने मेरे साथ जिस्मानी ताल्लुक़ात क़ायम किया था. ''

यहां भी स्पष्ट है कि हज़रत आयशा 6-7 साल की रही थीं जब पैग़म्बर के साथ उनका निक़ाह हुआ था.फिर, नौ साल की उम्र में उनके साथ शादी का रिश्ता/शारीरिक संबंध स्थापित हुआ था.

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सुनन अबू दाउद, हदीस संख्या 2121 (स्क्रीनशॉट) 


इस प्रकार, यहां स्पष्ट हो जाता है कि नुपुर शर्मा ने जो कुछ भी हज़रत आयशा की उम्र (शादी के वक़्त की) को लेकर कहा था, उसमें कुछ ग़लत नहीं था.वह सब इस्लामी पाठों (Text) में दर्ज़ हैं, प्रमाण के रूप में मिल जाते हैं.

 

कहने का तरीक़ा ग़लत था?

इसमें कोई दी राय नहीं है कि पैग़म्बर मोहम्मद और हज़रत आयशा की शादी और उम्र को लेकर नुपुर शर्मा द्वारा दिए गए बयानों का तरीक़ा (अंदाज़-ए-बयां) ग़लत था.तथ्य सही थे पर, उनके शब्दों में तल्खी थी और नीचा दिखाने के मक़सद से बोले गए थे.यह उचित नहीं था चाहे तस्लीम रहमानी द्वारा शिवलिंग के अपमान के बदले के तौर पर ही क्यों न कहे गए हों.

ज्ञात हो कि दूसरे धर्म-मज़हब के लोग गुड़ियों के साथ खेलने वाली उम्र में हज़रत आयशा के निक़ाह-शादी को चाहे जिस रूप में लें, इसे सही मानें या ग़लत मगर, इस्लाम के अनुयायी इसे जायज़ मानते हैं.इससे उनके पैग़म्बर की शान में कोई कमी नहीं आती या कोई सवाल नहीं उठता, ऐसा वे सोचते और दृढ़ता से मानते भी हैं.ऐसे में, सभी को उनके विश्वास का सम्मान करना चाहिए.

किसी भी धर्म-मज़हब के बारे में तथ्यों पर बात की जा सकती है.


क्या पैग़म्बर व उनके परिवार की बात करना ग़लत है?

पैग़म्बर मोहम्मद और उनके परिवार के सदस्यों के बारे में बात करना ग़लत नहीं है.ग़लत है, अपमानजनक या निंदनीय टिप्पणी करना.
 
अपनी ओर से बेअदबी या अपमानजनक टिप्पणी के बगैर, इतिहास और मज़हबी किताबों के आधार पर अल्लाह और उसके रसूल या संदेशवाहक या भविष्यवक्ता के जीवन चरित्र पर चर्चा हो सकती है.
 
इस्लाम की बात पर ऐतराज़ करने वालों को भी यह समझना होगा कि अगर पैग़म्बर मोहम्मद और उनके इस्लाम की चर्चा ही नहीं होगी, तो लोग इस्लाम यानि इस अरबी दीन (मज़हब) को समझेंगें कैसे?

लोग जब समझेंगें ही नहीं, तो वे इसकी ओर आकर्षित कैसे होंगें? वैचारिक आधार पर इस्लाम का प्रसार/विस्तार कैसे होगा?

पैग़म्बर और उनके परिवार के सदस्यों पर बात करना ग़लत नहीं है, यह मद्रास हाईकोर्ट 2019 में अपने एक आदेश में स्पष्ट कर चुका है.

पैग़म्बर पर टिप्पणी, शिवलिंग का अपमान, दोहरा रवैया
मद्रास हाईकोर्ट के फ़ैसले की कॉपी (स्क्रीनशॉट) 


अपने ऐतिहासिक फ़ैसले में कोर्ट ने कल्याणसुन्दरम रंगास्वामी नामक व्यक्ति को फेसबुक पर पैग़म्बर मोहम्मद और उनके परिवार के बारे में लेख/पोस्ट लिखने को व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताते हुए उसे ईशनिंदा के आरोप से मुक्त कर दिया था.

ज्ञात हो कि इस मामले में अदालत ने रंगास्वामी के फेसबुक पोस्ट की बाक़ायदा समीक्षा की थी और यह पाया था कि उसमें कही गई बातें प्रासंगिक इतिहास और इस्लामी किताबों पर आधारित है.

इस प्रकार, धर्म-मज़हब के ठेकेदारों को यह समझ लेना चाहिए कि धार्मिक मान्यताओं के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणी करना तो ग़लत है लेकिन, उससे संबंधित पूरे साहित्य अथवा इतिहास को पढने के बाद अपनी राय व्यक्त करना या आलोचना करना कहीं से भी ग़लत नहीं है.

फिर भी, अगर कहीं कोई ग़लत बात होती है, तो एकतरफ़ा न होकर बयानों-टिप्पणियों की निष्पक्षता से समीक्षा हो, विद्वानों के बीच शास्त्रार्थ हो, और तब निर्णय हो कि क्या ग़लत या सही है.

सामाजिक तौर पर भी बहुत कुछ सुलझाए जा सकते हैं.ग़लत लोग दंडित किए जा सकते हैं.

फिर भी, बात न बने, तो अदालतों के दरवाज़े खुले हैं.एक सेक्यूलर देश में किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है.          

सच बोलना कमज़ोरों के बस की बात नहीं और साहसी झूठ नहीं बोलते.इसलिए सच बोलें और अपने विचार प्रकट करें.धन्यवाद.

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