जानिए कैसे होती है उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त




               रमाशंकर पांडेय | 
चुनाव में हारा हुआ उम्मीदवार,जो किसी निर्वाचन क्षेत्र में डाले गए कुल वैध मतों की संख्या के 'छठे हिस्से' से ज्यादा मत हासिल करने में यदि नाक़ाम हो जाता है तो उसकी 'ज़मानत राशि' ज़ब्त हो जाती है.इसे 'ज़मानत ज़ब्त होना' कहते हैं.पंचायत से लेकर लोकसभा तक के चुनावों में यही संविधानिक प्रक्रिया समान रूप से लागू है जबकि ज़मानत की राशि अलग-अलग निर्धारित की गई है.


उम्मीदवारों की ज़मानत,ज़मानत रक़म,ज़ब्ती की प्रक्रिया
ज़मानत रक़म ज़मा कराने जाते नेता 


ग़ौरतलब है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में चुनाव त्यौहार सरीखे होते हैं जिनकी व्यवस्था एवं कार्यान्वयन का सारा दारोमदार चुनाव आयोग पर होता है.जीत-हार के अलावा किसकी ज़मानत राशि लौटाने अथवा ज़ब्त करने योग्य है इन सबका निर्णय चुनाव आयोग ही करता है.
  


क्या होती है ज़मानत राशि? 

चुनाव में केवल संज़ीदा उम्मीदवार ही भाग ले सकें,इस मक़सद से एक धरोहर राशि अथवा ज़मानत ज़मा रक़म के रूप में उनपर एक आर्थिक शर्त भी लगाईं गई है,जिसे ज़मानत राशि कहते हैं.इसके तहत चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवारों को चुनाव आयोग के पास एक निश्चित रक़म ज़मा करनी होती है,जो नतीज़ों के बाद,निश्चित मत प्रतिशत हासिल करने में कामयाब होने पर वापस कर दी जाती है अन्यथा ज़ब्त हो जाती है यानि आयोग की हो जाती है.

उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान के लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम,1951 (Representation of the People Act, 1951, Section 34. Deposits  )      की धारा  34  (1) (ए)  तथा  (बी)  के मुताबिक सामान्य उम्मीदवारों द्वारा ज़मा की जाने वाली राशि तथा आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को मिलने वाली छूट(आधी) के बारे में विस्तृत चर्चा की गई है.साल 2009 (01-02-2010) में ज़मानत राशि में बढ़ोतरी की गई थी जो अबतक लागू है.
    
लोकसभा चुनाव में सामान्य उमीदवारों को 25,000 रुपए ज़मा कराने होते हैं जबकि अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए इसकी आधी रक़म यानि 12,500 रुपए ही ज़मा कराने की व्यवस्था दी गई है.वहीं विधानसभा के लिए सामान्य वर्ग के उमीदवारों के लिए तय रक़म 10,000 रुपए है जबकि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार के लिए 5,000 रुपए निश्चित है.इसकी व्यवस्था के अंतर्गत राज्यों में शहरी निकायों यानि पार्षद के चुनावों तथा गाँव की पंचायतों के चुनावों के लिए भी राशि मुक़र्रर है.


उम्मीदवारों की ज़मानत,ज़मानत रक़म,ज़ब्ती की प्रक्रिया
ज़मानत रक़म का सांकेतिक चित्र 

2009 से पहले यह राशि काफ़ी कम थी.लोकसभा के लिए ज़नरल कैटेगरी के उम्मीदवारों के लिए ज़मानत राशि 10,000 रुपए थी जबकि एससी-एसटी के उम्मीदवारों के लिए यही राशि 5,000 रुपए निश्चित थी.वहीं विधानसभा के लिए ज़नरल तथा एससी-एसटी कैटेगरी के उम्मीदवारों के लिए राशि क्रमशः 250 रुपए व 125 रुपए थी. 
निम्न तालिका में विभिन्न चुनावों तथा पदों के लिए तय ज़मानत राशि दर्शायी गई है:-
 

चुनाव (उम्मीदवार)                         सामान्य वर्ग                               आरक्षित वर्ग (अजा0/अजजा0)

लोकसभा (सांसद)                              25,000                                      12,500  

विधानसभा (विधायक)                        10,000                                     ₹ 5,000 

शहरी निकाय (पार्षद)                        ₹ 5,000                                                 2,500   

ग्रामीण निकाय 
   

पंच                                               ₹ 100                                                    ₹ 40 

सरपंच                                           ₹ 200                                                  ₹ 100                

ब्लॉक समिति                                 ₹ 300                                                   ₹ 150 

जिला परिषद                                  ₹ 400                                                   ₹ 200  


ज़मानत राशि की ज़ब्ती व वापसी 

जनप्रतिनिधित्व कानून,1951 की धारा 158 (

Section 158. Return or forfeiture of candidate's deposit

) में उम्मीदवारों द्वारा ज़मा कराई गई रक़म वापस करने के तरीक़ों के बारे में बताया गया है.इन्हीं तरीक़ों में से एक तरीका है जो यह तय करता है कि किस उम्मीदवार की ज़मानत रक़म ज़ब्त होगी.


ज़मानत राशि की ज़ब्ती 

यदि कोई उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत पाता है तथा जिस सीट से वह चुनाव लड़ा है वहां डाले गए कुल वैध मतों के छठे हिस्से से अधिक मत हासिल करने में नाक़ाम रहता है तब चुनाव आयोग उसकी ज़मानत राशि ज़ब्त कर लेता है.वह राशि चुनाव आयोग की हो जाती है.मिसाल के तौर पर अगर किसी सीट पर 1 लाख की संख्या में कुल वैध मत पड़े हैं,तो ज़मानत बचाने के लिए उमीदवार को उसके छठे हिस्से(16.6%) से ज़्यादा यानि क़रीब 16,666 से ज़्यादा ( कम से कम 16,666 +1=16,667) मत हासिल करने होंगें.

  

ज़मानत राशि की वापसी के प्रावधान 

उपरोक्त क़ानून में जमानत रक़म की वापसी के लिए निम्नलिखित विभिन्न परिस्थितियों का वर्णन है-

   कोई उम्मीदवार यदि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की सूची में नहीं दिखाया गया है तो चुनाव आयोग उसकी ज़मानत रक़म वापस कर देगा.इसके दो कारण संभव हैं-

1. उसका नामांकन रद्द हो गया हो;या  
2. स्वीकृति के बाद उसने स्वयं अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली हो.
जो भी कारण(कोई एक) रहा हो,दोनों ही परिस्थितियों में ज़मानत राशि की वापसी का प्रावधान है.
   
  कोई उम्मीदवार यदि मतदान शुरू होने से पहले मर जाता है तो ऐसी परिस्थिति में चुनाव आयोग ज़मानत की राशि उसके परजनों को वापस करेगा.

  कोई उम्मीदवार चुनाव हार जाता है लेकिन,यदि उसने कुल वैध मतों के छठे हिस्से से ज़्यादा मत प्राप्त कर लेता है तो उसकी ज़मानत रक़म वापस हो जाएगी.

  कोई उम्मीदवार यदि चुनाव जीत जाता है तो वह ज़मानत राशि वापस प्राप्त करने का हक़दार हो जाता है.इसमें ये भी कहा गया है- 'उम्मीदवार ने भले ही डाले गए कुल वैध मतों के छठे हिस्से से ज़्यादा मत हासिल किए हों अथवा नहीं उसकी ज़मानत राशि वापस हो जाएगी.'

  कोई उम्मीदवार विभिन्न चुनावों में यदि एक से अधिक स्थानों (एक से अधिक सीटों) पर लड़ा हो तो केवल एक सीट की ज़मानत राशि की वापसी ही संभव हो सकेगी जबकि अन्य सीटों की ज़मानत रक़में स्वतः ज़ब्त हो जाएंगीं.
लेकिन,चुनावी इतिहास में इसके अपवाद भी मौज़ूद है.ऐसे दो मौक़े सामने आए जब जीते हुए उम्मीदवार भी डाले गए कुल वैध मतों के छठे हिस्से से ज़्यादा मत प्राप्त करने में नाक़ाम रहे तो चुनाव आयोग ने उनकी ज़मानत ज़ब्त कर ली थी.क्या था पूरा मामला ये जानने के लिए पढ़ें- 

 
और चलते चलते अर्ज़ है ये शेर....

सरों पर ताज़ रक्खे थे क़दम पर तख़्त रक्खा था,
वो कैसा वक़्त था मुट्ठी में सारा वक़्त रक्खा था |

और साथ ही,

हमें तो अहल-ए-सियासत ने ये बताया है,
किसी का तीर किसी की कमान में रखना |

सच बोलना कमज़ोरों के बस की बात नहीं और साहसी झूठ नहीं बोलते.इसलिए सच बोलें और अपने विचार प्रकट करें.धन्यवाद.

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