केंद्र में मोदी सरकार की ये दूसरी पारी है और वो भी प्रचंड बहुमत से.इसे पहली पारी का विस्तार कह सकते हैं.देश की जनता जहाँ एक ओर सरकार द्वारा किये गए कार्यों से संतुष्ट दिखाई देती है वहीँ मोदी के हाथों भविष्य के प्रति आश्वस्त नज़र आती है.उसने राष्ट्रीय मुद्दों और विकासवादी नीतियों पर भरोसा कर दिल खोलकर समर्थन किया है जो अब भी जारी है.केंद्र में मोदी का जलवा बरक़रार है मगर पिछले कुछ वक़्त से राज्यों में मिज़ाज़ कुछ बदला-बदला सा नज़र आ रहा है.वहां जनता में मोदी का असर घटता प्रतीत हो रहा है और लगता है मोदी का ज़ादू चल नहीं रहा है.वहां मोदी को अनदेखा-अनसुना किया जा रहा है मानो दबी ज़ुबान में अवाम कह रही हो कि 'तुम दिल्ली देखो,राज्यों का फैसला हम पर छोड़ दो'.अब देखिये,मोदी के प्रथम प्रधानमंत्रित्व काल और शुरूआती दौर में जो भारत भगवामय दिखाई दे रहा था वो दूसरे दौर में नज़र नहीं आ रहा है.भगवा सिमट रहा है.अब सवाल उठता है कि एक जगह मोदी की हरेक आवाज़ ज़ोरदार है तो दूसरी जगह कमज़ोर क्यों है? दूसरे शब्दों में,लोकसभा चुनाओं में मोदी की अपील फलदायी है तो विधानसभा चुनाओं में निष्फल क्यों?
राजनीतिक पंडितों की बात करें तो उनका विश्लेषण ये बताता है कि मोदी का जादू अब भी बरक़रार है और दिखता भी है.वो वोट पर्सेंट की बात करते हैं और दायरे में बढ़ोतरी की दलील पेश करते हैं.इस तर्क में दम है मगर ये सच्चाई भी है कि बीजेपी पांच-छह राज्यों में लगातार घटी है और हारी भी है.और क्योंकि विजय को विजय कहते हैं और पराजय को पराजय इसलिए मंथन जरुरी है.जरुरी है निष्पक्ष एवं तर्कपूर्ण विश्लेषण की जो तथ्यों पर आधारित हो और दलीलें हों कसौटी पर खरी.क्या है वास्तविक स्थिति और उसके कारण क्या हैं ये चर्चा का विषय है.मेरी राय में राज्यों में मोदी के जादू या जलवे में कमी आने के निम्नलिखित काऱण हैं-
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| राज्यों में उतरता भगवा रंग:पहुंचा 71 फ़ीसदी से 35 फ़ीसदी |
1. अमित शाह का अध्यक्ष पद छोड़ना:
राज्यों में मोदी रथ की रफ़्तार धीमी होने अथवा थमने का सबसे बड़ा कारण है अध्यक्ष पद पर अमित शाह जैसे करिश्माई व्यक्तित्व का ना होना.चुनावी रण में बीजेपी के सेनानायक और वर्तमान राजनीति के चाणक्य कहे जानेवाले अमित शाह की कमी संगठन को खल रही है.कार्यकर्ताओं में जोश व उनका आम जनता से संवाद कम होता नज़र आ रहा है.और यही कारण है कि समावेशी विचारों द्वारा विभिन्न सामाजिक-धार्मिक व राजनैतिक घटकों से जुड़ाव व सहयोग की प्रक्रिया धीमी पड़ गई है तथा सांगठनिक विस्तार लगभग थम सा गया है.रिकॉर्ड पर नज़र डालें तो पता चलता है कि 2015 में जहाँ बीजेपी सदस्यों की संख्या 11 करोड़ थी 2018 के अंत तक 18 करोड़ के पार हो गई.जुलाई 2019 के सदस्य्ता अभियान में क़रीब 7 करोड़ नए सदस्य जुड़े.टाइम्स ऑफ़ इंडिया(अंक-29 अगस्त,2019) के अनुसार,शाह के नेतृत्व में 2015 में सदस्यता अभियान के तहत केवल 2. 2 करोड़ का लक्ष्य रखा गया था जबकि क़रीब 6 करोड़ नए सदस्य जुड़े.बीजेपी की ये सदस्य संख्या दुनिया के अधिकाँश देशों की कुल आबादी से ज़्यादा और केवल सात देशों की कुल आबादी से कम के आंकड़ों को दर्शाती है.नतीजा अप्रत्याशित रहा क्योंकि इसमें शाह का दिमाग और उनकी लगन व मेहनत शामिल थी.![]() |
| अध्यक्ष पद पर रहते अमित शाह ने बीजेपी को देशभर में फैलाया |
2. राज्यों में कर्मठ व लोकप्रिय नेताओं का अभाव:
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| ये हैं बीजेपी के वो अकुशल नेता और असफल मुख्यमंत्री जिन्होंने पार्टी की साख को बट्टा लगाया |
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| जनता दरबार में आये लोगों से एक एक कर मिलते मुख़्यमंत्री योगी आदित्यनाथ |
3.उधोग-धंधे व रोजगार का अभाव:
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| रोज़गार कार्यालय के सामने उमड़ा ये बेरोज़गारों का सैलाब देखकर भी राजनेताओं का दिल नहीं पसीजता |
4.गरीब व किसानों में असंतोष:
गरीबी दूर करने के मसले पर कांग्रेस को पीछे धकेल सत्ता पर क़ाबिज़ हुए भाजपाई कुछ नया नहीं कर सके और उनके सारे वादे कागज़ों पर धरे रह गए.ग़रीब विकास की बाट जोहते-जोहते ऊब गए और अपना रोष ज़ाहिर कर दिया.
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| भारत के गांवों में बसता ग़रीब परिवार और उसका घर संसार |
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| क़र्ज़ के बोझ तले दबे वो असली ग़रीब किसान जिनकी चिंता नहीं राजनीति होती है |
दुर्भाग्यपूर्ण,मगर ये सच है कि आज ज़्यादातर किसान लोन लेते ही है हज़म करने के लिए.हालांकि जायज़-नाज़ायज़ मांगों के साथ लोन माफ़ी के लिए ये संघर्ष की प्रवृति उनमें सत्ता वापसी के लिए लालायित कांग्रेस व उसके समविचारी दलों ने डाली है लेकिन ये रोग उन्हें लग चुका है जो देश की दशा-दिशा पर ग़लत असर डालने वाला है.दरअसल,लोन माफ़ी फौरी राहत है कोई समाधान नहीं.किसानों को समझना होगा कि ये किसी खास संकट में हो तो उचित है वर्ना विकास करना तो दूर किसी सरकार का चलना भी मुश्किल होगा.और जो दल ऐसे दावे करता है समझ लीजिये वो ठग रहा है.इसकी मिसाल राजस्थान,मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तित करने वाले किसान देख चुके हैं.गौरतलब है कि जो किसान लोन माफ़ी की मांग करता है वो अपने बच्चों की शिक्षा,स्वास्थ्य,रोजगार व अन्य नागरिक सुविधाओं की मांग रखने का हक़ खो देता है.ये अज्ञानता के साथ-साथ एक चारित्रिक दोष भी है.
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| विपक्ष के प्रायोजित आंदोलन के प्रसारण के लिए फिल्मांकन करती पेड मीडिया |
5. जातीय समीकरण व तुष्टिकरण:
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| बीजेपी का तुष्टिकरण:मुसलमानों की इज़्ज़त-अफ़ज़ाई |
6. संघ के कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता:
संघ के कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता भी विगत चुनावों में बीजेपी की विभिन्न राज्यों में हार का महत्वपूर्ण कारक रही.इसे समझने के लिए संघ को समझना होगा.दरअसल,बीजेपी की मातृ-संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(आरएसएस ) व उसके विभिन्न आनुसंगिक संगठनों से जुड़े लोगों की चुनावों में बड़ी भूमिका होती है.चूँकि उनका दायरा विस्तृत और सामाजिक-सांस्कृतिक होता है इसलिए वो वहां भी पहुंच जाते और असर डालते हैं जहाँ बीजेपी के लोग नहीं पहुंच पाते.अपने संपर्क-सूत्रों से वो पार्टी और विभिन्न वर्गों के बीच संवाद स्थपित कर एक पुल का काम करते हैं.
लेकिन संघ परिवार में अब बदलाव देखने को मिल रहा है जिसे हम दो वर्गों में बाँट सकते हैं-सैद्दांतिक और व्यावहारिक.सैद्दांतिक वर्ग के लोग आज भी अपने मूल उद्देश्य पर अडिग हैं जबकि व्यावहारिक वर्ग वाले समय के साथ विभिन्न मुद्दों पर समझौते के पक्षधर हैं.उनका मानना है कि समय के साथ चलते हुए अपनी उपस्थिति में विस्तार कर उचित अवसर का इंतज़ार करना चाहिए.आज संघ में ऐसे लोगों वर्चस्व है.इसलिए आज जो संघ हम देख रहे हैं वो बाहर से कुछ और है और अंदर से कुछ और.यानि आज का संघ ढांचे से तो वही है लेकिन बाकी सबकुछ बीजेपी का हो चुका है.संक्षेप में हम आज इसे बीजेपी की सांस्कृतिक ईकाई कह सकते हैं.
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| राष्ट्र-निर्माण और रक्षा में अग्रणी भूमिका निभाने वाले संघ के स्वयंसेवकों की परेड |
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| बदलता संघ और उसके स्वयंसेवक:मूल उद्देश्य से भटके भाजपा की गोद में जा बैठे |
लोकतंत्र में किसी भी शासन की एक अवधि होती है जिसके पूरे हो जाने पर फिर से जनता के बीच जाकर अपने कार्यों का हिसाब-क़िताब देना होता है.और ये जनता पर निर्भर करता है कि अपने मूल्यांकन के बाद किस निष्कर्ष पर पहुँचती है.जनता वर्तमान सरकार को दुबारा लाना चाहती है या उसे हटाकर किसी अन्य दल को मौका देना चाहती है.दरअसल ये एक कठिन वक़्त होता है जिसे परीक्षा की घड़ी भी कहते हैं जिसमें वर्तमान दल जनता को फिर से मनाने और उसे समर्थन के लिए तैयार कर पाता है या नहीं या फिर कोई और दल बाज़ी मार जाता है.ऐसे में वर्तमान दल अपने सारे तंत्र झोंक देता है.यहाँ अगर वर्तमान दल के पास संघ जैसा संगठन है तो वो उसे भी लगाता है.लेकिन यहाँ ये सवाल उठता है कि संघ के जिन लोगों की सक्रियता के दम पर पिछली बार बात बनी थी वो दुबारा तभी जायेंगे जब सरकार ने वादे के मुताबिक काम किये होंगे वर्ना घर बैठ जायेंगे.बीजेपी द्वारा हारे गए राज्यों में भी ऐसा ही हुआ.सरकार के साथ रेवड़ियां बांटकर खाने वाले व्यावहारिक वर्ग के लोग घरों में दुबके रहे और पहले से क्षुब्ध सैद्दांतिक लोगों ने मोर्चा सँभालने से मना कर दिया और बीजेपी का बंटाधार हो गया.
7. छलिया टाइप उम्मीदवार की कमी:
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| केजरीवाल की करामात:मुफ़्त बिजली-पानी के मास्टरस्ट्रोक से प्रचंड बहुमत |











